ढोला - मारू की प्रेम कहानी
आठ कुआँ, नौ बावडी, सोलह सौ पनिहार जिनके आवत जात से, गढ़ में रहत बहार। सोरठियो दूहो भलो, भलि मरवणरी बात।जोवन छाई धण भली, तारांछाई रात।। राजस्थान की मिट्टी वीरो के शौर्य और बलिदान के लिए मशहूर है। यहां के योद्धाओं की गाथाएं आज भी बड़े गर्व से सुनाई जाती हैं। केवल वीरों की गाथाएं नहीं हैं बल्कि उनकी कई की वसुंधरा पर कई प्रेम कहानियां भी हैं, जो आज भी बहुत प्रचलित हैं। यहां कभी एक वेश्या ने अपने प्रेम के लिए पूरी सल्तनत को चुनौती दी तो कभी एक दासी के रूप के आगे नतमस्तक हो गया राजा। लेकिन आज हम आपको बता रहे है राजस्थान की सबसे चर्चित प्रेम कहानी जो इतिहास में ‘ढोला-मारू’ की प्रेम कहानी के नाम से विख्यात है। आज भी इस प्रेमी जोड़े का जिक्र यहां के लोकगीतों में होता है। नरवर के राजा नल के तीन साल के पुत्र साल्हकुमार का विवाह बचपन में जांगलू देश (बीकानेर) के पूंगल नामक ठिकाने के स्वामी पंवार राजा पिंगल की पुत्री से हुआ था। चूंकि दोनों अभी बहुत छोटे थे इसलिए दुल्हन को ससुराल नहीं ले जाया गया। बड़े होने पर राजकुमार की एक और शादी कर दी गई। अब तक राजकुमार अपनी बचपन में हुई शादी के बारे में...